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महिला की मर्जी के बिना उसे मां बनने के लिए मजबूर नहीं कर सकती अदालत

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में महिला के प्रजनन संबंधी अधिकारों और उसकी स्वायत्तता को सर्वोपरि माना है। कोर्ट ने शुक्रवार को एक 18 वर्षीय युवती को 30 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति दे दी। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि किसी भी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना की अध्यक्षता वाली पीठ ने बांबे हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें गर्भपात की अनुमति देने से इनकार कर दिया था। साथ ही हाई कोर्ट ने सुझाव दिया था कि युवती को बच्चे को जन्म देना चाहिए और बाद में उसे गोद दे देना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत किसी भी महिला को उसकी गर्भावस्था पूरी करने के लिए मजबूर नहीं कर सकती, यदि वह ऐसा नहीं करना चाहती है।

बता दें कि युवती ने 17 साल की उम्र में गर्भधारण किया था और अब वह 18 साल चार महीने की है। यह गर्भ एक मित्र के साथ संबंध के कारण ठहरा था। कोर्ट ने माना कि इस गर्भावस्था को जारी रखना युवती के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से बेहद दर्दनाक होगा। मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में कहा गया कि गर्भपात की प्रक्रिया से युवती की जान को कोई गंभीर खतरा नहीं है। युवती के वकील ने तर्क दिया कि अवैध बच्चे को जन्म देने से जुड़े सामाजिक कलंक के कारण उसे गहरा मानसिक आघात पहुंचेगा। कोर्ट ने सहमति जताते हुए कहा कि अपीलकर्ता के अधिकारों की रक्षा करना अनिवार्य है, भले ही निर्णय लेने में देरी हुई हो।


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