धरती पर ‘सूरज’ बनाने की रेस में भारत, PRAGYA ने पहली बार बनाया प्लाज्मा

भारत में न्यूक्लियर फ्यूजन रिसर्च को लेकर प्राइवेट सेक्टर ने एक बड़ा कदम उठाया है। बंगलुरु की स्टार्टअप प्रनोस फ्यूजन ने अपने टोकामक प्रज्ञा (पीआरएजीवाईए) में पहली बार प्लाज्मा बनाया है। करीब 40 सेंटीमीटर रेडियस वाले इस टोकामक को कंपनी ने लगभग आठ महीने में तैयार किया है। इसका इस्तेमाल प्लाज्मा को कंट्रोल करने, उसकी जांच करने और फ्यूजन से जुड़ी दूसरी तकनीकों को टेस्ट करने के लिए किया जाएगा। प्रज्ञा का काम अभी बिजली बनाना नहीं है। यह एक तरह की टेस्ट मशीन है, जिस पर कंपनी लगातार प्रयोग करेगी। कंपनी इसे करीब 20 साल तक चलाने की योजना बना रही है। इस दौरान हर साल करीब 3,000 प्लाज्मा शॉट लेने का लक्ष्य है। यानी रोजाना करीब 10 से 12 बार प्लाज्मा बनाकर उससे जुड़ा डाटा इक_ा किया जाएगा। इस डाटा से आगे बड़े फ्यूजन रिएक्टर बनाने में मदद मिल सकती है।
टोकामक एक ऐसी मशीन है, जिसमें बहुत गर्म प्लाज्मा को चुंबकीय ताकत की मदद से कंट्रोल किया जाता है। फ्यूजन के लिए गैस को बहुत ज्यादा गर्म किया जाता है। इतनी गर्मी में गैस प्लाज्मा में बदल जाती है। फ्यूजन में छोटे परमाणुओं को आपस में जोडक़र एनर्जी बनाने की कोशिश की जाती है। सूरज में भी इसी तरह की प्रक्रिया से एनर्जी बनती है। वैज्ञानिक कई साल से धरती पर इस प्रक्रिया को कंट्रोल करके एनर्जी बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
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2030 तक बड़ा रिएक्टर बनाने का लक्ष्य
प्रनोस फ्यूजन कंपनी की योजना 2027 तक एचटीएस मैग्नेट को चालू करने की है। इसके बाद वह 2030 तक प्रनीक नाम का नेट एनर्जी गेन रिएक्टर बनाने का लक्ष्य रखती है। नेट एनर्जी गेन का आसान मतलब है कि फ्यूजन से जितनी एनर्जी मिले, वह उसे चलाने में लगाई गई एनर्जी से ज्यादा हो। हालांकि, यह अभी कंपनी का लक्ष्य है। प्रज्ञा खुद नेट एनर्जी गेन रिएक्टर नहीं है। यहां बता दें कि कंपनी प्रज्ञा के जरिए सिर्फ तकनीक पर काम नहीं करना चाहती। वह ज्यादा से ज्यादा फ्यूजन वैज्ञानिक और प्लाज्मा फिजिसिस्ट तैयार करने की भी योजना बना रही है। इसके लिए प्रज्ञा पर लंबे समय तक प्रयोग किए जाएंगे, ताकि वैज्ञानिकों और छात्रों को फ्यूजन तकनीक को समझने और उस पर काम करने का मौका मिले। उम्मीद है कि इससे भारत में फ्यूजन रिसर्च और इस क्षेत्र से जुड़े काम को बढ़ावा मिलेगा।
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